साँप

सर्प से निर्भय रहें – ॐ नमः शिवाय

ओम नम शिवाय!

आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि साँप सुन नहीं सकता , क्यों कि इसके कान ही नहीं होते हैं । बीन द्वारा सपेरा हमें भ्रम में रखने हेतु साँप के आगे बीन बजाता है !

आपने यह भी देखा होगा , कि सपेरा बीन बजाने के दौरान साँप को बीच-बीच में हाथ मारकर क्रोध दिलाता है , ताकि साँप अपना फन उठाकर रखे , बस सपेरे की यही चाल कामयाब हो जाती है , तथा आसपास खड़े व्यक्ति समझते हैं कि साँप बीन पर नाच रहा है ! !!

ओम नम शिवाय
ओम नम शिवाय

किंतु एक नाम ऐसा है , जिसे यदि सर्प अथवा साँप के आगे उच्चारित कर लिया जाए , तो निश्चय ही साँप वहाँ से दुम दबाकर कर भाग खड़ा होगा ! जी हाँ ! यह बिल्कुल सत्य है , चाहे तो कभी परीक्षा करके स्वयं ही इस सच्चाई की पुष्टि कर सकते हैं ! !!

इसी संदर्भ में एक अति लघु प्रसंग प्रस्तुत है, जिसमें आपको यह भी ज्ञात हो जाएगा कि किसका नाम लेने से सर्प वापिस भाग जाता है !

अभिमन्यु के पुत्र राजा परीक्षित की मृत्यु श्रृंगी ऋषि के शाप से तक्षक नाग के द्वारा डंसने से हुई ।

साँप
ओम नम शिवाय

अपने पिता परीक्षित की मृत्यु का प्रतिशोध लेने हेतु परीक्षित के पुत्र ‘राजा जन्मजेय’ ने सर्प यज्ञ किया ।

यज्ञ करते समय उच्चारित विशेष मन्त्रों के प्रभाव से साँप स्वत: ही आकर यज्ञाग्नि में गिरकर भस्म होने लगे ! इससे नागलोक में हाहाकार मच गया तथा नाग देवता बड़े चिंतित हुए !

तब ‘आस्तिक मुनि’ ने आकर सर्पों की प्राणरक्षा की थी । उस समय सर्पों ने आस्तिक मुनि को वचन दिया था कि जो भी आप का नाम लेगा , उसे सर्प नहीं काटेगा , और तत्काल वापिस चला जाएगा ।

और यदि सर्प वापिस न लौटा तो उसी क्षण उसके फन के ‘शीशम के फूल’ की तरह सैकड़ों टुकड़े हो जाएँगे !!

बस ! तभी से आस्तिक मुनि का नाम लेते ही सर्प तुरंत वहाँ से वापिस भाग खड़ा होता है !

आपको भी कभी सर्प दिख जाए , तो अवश्य यह आजमाकर देखिएगा ! आप आश्चर्य चकित हो उठेगें !

चाहे कैसा भी भयंकर विषधर क्यों न हो , आस्तिक मुनि की “सौगंध” देने से अथवा “मुनिराजं आस्तिकं नम:” मंत्र का उच्चारण करने से वापिस भाग खड़ा होगा !

घर के मुख्य प्रवेश द्वार पर यदि लाल स्याही से “मुनिराज आस्तिक नम: “लिख देने से घर में सर्प (साँप) प्रवेश नहीं कर सकता है ! सोते समय यदि “मुनिराजं आस्तिकं नम : ” का एक बार उच्चारण कर लिया जाए , तो व्यक्ति सर्प भय से मुक्त रहता है ! !!

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